महिला अपराध की FIR कैसे दर्ज करें?
महिला के विरुद्ध संज्ञेय अपराध की FIR कहाँ और कैसे दर्ज कराएं, महिला अधिकारी से जुड़े विशेष नियम, दिव्यांग पीड़िता की कानूनी सुरक्षा और FIR दर्ज न होने पर उपलब्ध उपाय समझें।
महिला के विरुद्ध संज्ञेय अपराध होने पर दर्ज की जाने वाली FIR कोई अलग प्रकार की FIR नहीं होती। सामान्य FIR प्रक्रिया ही लागू होती है, लेकिन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 कुछ निर्धारित महिला-संबंधी अपराधों में सूचना दर्ज करने के तरीके और पीड़िता की स्थिति के आधार पर अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा देती है। इसलिए किसी महिला के मामले में यह समझना जरूरी है कि कौन-से नियम सभी संज्ञेय अपराधों पर लागू होते हैं और कौन-सी विशेष सुरक्षा केवल कानून में बताई गई परिस्थितियों में मिलती है।
केवल पीड़िता के महिला होने से हर विशेष नियम अपने-आप लागू नहीं हो जाता। दूसरी ओर, जहाँ BNSS किसी विशेष परिस्थिति में अलग प्रक्रिया निर्धारित करता है, वहाँ उसका पालन करना आवश्यक है।
महिला अपराध की FIR कहाँ दर्ज कराई जा सकती है?
BNSS की धारा 173(1) के अनुसार किसी संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को दी जा सकती है, चाहे अपराध किसी भी क्षेत्र में हुआ हो। इसका अर्थ है कि अपराध की सूचना देने का अधिकार केवल उसी पुलिस थाने तक सीमित नहीं है जिसके क्षेत्र में घटना हुई थी।
उदाहरण के लिए, यदि किसी महिला के साथ अपराध हुआ और उसे यह स्पष्ट नहीं है कि घटना वास्तव में किस पुलिस थाना क्षेत्र में हुई। वह निकटतम पुलिस थाने में सूचना देती है। केवल यह कहकर सूचना दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता कि पहले यह तय किया जाए कि अपराध किस थाना क्षेत्र में हुआ था। आवश्यकता होने पर दूसरे जिले या राज्य के पुलिस थाने में भी FIR दर्ज कराई जा सकती है।
BNSS की धारा 173(1) यह स्पष्ट करती है कि संज्ञेय अपराध की सूचना कहाँ दी जा सकती है। इसके बाद मामले की जाँच किस पुलिस थाने या पुलिस इकाई द्वारा की जाएगी, यह क्षेत्राधिकार से जुड़ा अलग प्रश्न है। इसलिए अपराध की सूचना प्राप्त करने और आगे की जाँच के क्षेत्राधिकार को एक ही चरण नहीं समझना चाहिए।
ऐसे मामले में दर्ज की गई FIR को सामान्यतः Zero FIR कहा जाता है। Zero FIR दर्ज होने के बाद मामला उस पुलिस थाने को भेजा जा सकता है जिसके क्षेत्राधिकार में अपराध हुआ है।
क्या महिला की हर FIR महिला पुलिस अधिकारी ही दर्ज करेगी?
BNSS ऐसा सामान्य नियम नहीं बनाता कि महिला द्वारा दी गई प्रत्येक शिकायत या प्रत्येक FIR केवल महिला पुलिस अधिकारी ही दर्ज करेगी। महिला अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज करने का विशेष नियम BNSS की धारा 173(1) में बताए गए कुछ निर्धारित अपराधों से जुड़ा है।
यदि किसी महिला के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 71, 74, 75, 76, 77, 78, 79 या 124 के तहत अपराध किए जाने या उसका प्रयास किए जाने की सूचना दी जाती है, तो ऐसी सूचना महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा दर्ज की जाएगी।
इन धाराओं में मुख्य रूप से बलात्कार और उससे संबंधित यौन अपराध, कपटपूर्ण साधनों आदि से यौन संबंध, सामूहिक बलात्कार, बार-बार अपराध करने वाले व्यक्ति से संबंधित प्रावधान, महिला की गरिमा पर हमला, यौन उत्पीड़न, निर्वस्त्र करने के उद्देश्य से हमला, ताक-झाँक, पीछा करना, महिला की गरिमा का अपमान तथा तेजाब आदि से गंभीर चोट पहुँचाने से संबंधित निर्धारित अपराध शामिल हैं। इस पेज पर इन अपराधों के तत्व या दंड नहीं समझाए जा रहे हैं; इन धाराओं का उल्लेख केवल यह स्पष्ट करने के लिए है कि महिला अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज करने वाला विशेष नियम किन मामलों में लागू होता है।
BNSS की धारा 173(1) का यह प्रावधान केवल उस स्थिति तक सीमित नहीं है जब निर्धारित अपराध पूरा हो चुका हो। कानून में अपराध किए जाने के साथ उसका प्रयास किए जाने की सूचना भी शामिल है। इसलिए केवल यह कहकर इस विशेष प्रक्रिया को नकारा नहीं जा सकता कि कथित अपराध पूरा नहीं हुआ था।
धारा 173(1) में केवल “महिला पुलिस अधिकारी” नहीं, बल्कि “महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी” का प्रावधान है। इसलिए इस नियम को केवल महिला पुलिसकर्मी की उपलब्धता तक सीमित करके समझना सही नहीं होगा। पहले यह देखना आवश्यक है कि मामला धारा 173(1) में बताए गए अपराधों में आता है या नहीं।
किसी अपराध में पीड़िता का महिला होना और उस अपराध का BNSS की धारा 173(1) की निर्धारित सूची में होना दो अलग बातें हैं। इसलिए महिला के विरुद्ध होने वाले प्रत्येक संज्ञेय अपराध में केवल पीड़िता के महिला होने के आधार पर महिला अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज करने वाला यह विशेष नियम लागू नहीं माना जा सकता।
FIR की सूचना मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से कैसे दी जा सकती है?
BNSS की धारा 173(1) के अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना मौखिक रूप से या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (electronic communication) से दी जा सकती है। यह केवल महिलाओं के लिए बनाया गया नियम नहीं है, बल्कि सामान्य FIR प्रक्रिया का हिस्सा है। महिला पीड़िता के लिए इसका व्यावहारिक महत्व यह है कि अपराध की सूचना देने के लिए पहले से लिखी हुई शिकायत लेकर स्वयं पुलिस थाने पहुँचना ही एकमात्र तरीका नहीं है।
यदि सूचना मौखिक रूप से दी जाती है, तो पुलिस थाने का प्रभारी अधिकारी उसे स्वयं या अपने निर्देशन में लिखित रूप में दर्ज कराएगा। इसके बाद लिखी गई सूचना, सूचना देने वाले व्यक्ति को पढ़कर सुनाई जाएगी और उस पर उसके हस्ताक्षर लिए जाएंगे।
यह प्रक्रिया केवल हस्ताक्षर लेने की औपचारिकता नहीं है। मौखिक रूप से बताई गई घटना जब पुलिस अभिलेख में लिखित रूप लेती है, तब सूचना देने वाले व्यक्ति को यह जानने का अवसर मिलता है कि उसके द्वारा बताई गई बात वास्तव में किस रूप में दर्ज हुई है।
मौखिक सूचना लिखे जाने के बाद यह देखना उपयोगी है कि घटना का मुख्य क्रम, स्थान, समय और उपलब्ध पहचान संबंधी तथ्य आपके बताए अनुसार दर्ज हुए हैं या नहीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि FIR में हर साक्ष्य देना आवश्यक है; उद्देश्य दर्ज सूचना की तथ्यात्मक शुद्धता देखना है।
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देने पर तीन दिन वाला नियम क्या है?
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से संज्ञेय अपराध की सूचना भेजने का अर्थ यह नहीं है कि संदेश भेजते ही BNSS की धारा 173(1) के तहत पूरी कानूनी प्रक्रिया अपने-आप पूरी हो गई। धारा 173(1)(ii) के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी गई सूचना को सूचना देने वाले व्यक्ति द्वारा तीन दिनों के भीतर हस्ताक्षरित किए जाने पर अभिलेख में लिया जाता है।
इसलिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से शिकायत भेजना और कानून के अनुसार सूचना का अभिलेख में लिया जाना हमेशा एक ही चरण नहीं हैं। तीन दिनों के भीतर हस्ताक्षर की आवश्यकता इसी कारण महत्वपूर्ण है।
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देने के अलावा कुछ मामलों में पुलिस के ऑनलाइन माध्यम भी उपलब्ध हो सकते हैं। लेकिन ऑनलाइन शिकायत भेजना और FIR दर्ज होना एक ही बात नहीं है; Online FIR की प्रक्रिया और उपलब्धता संबंधित पुलिस व्यवस्था पर निर्भर कर सकती है।
दिव्यांग पीड़िता के मामले में विशेष FIR प्रक्रिया कब लागू होती है?
BNSS की धारा 173(1) का दूसरा विशेष प्रावधान निर्धारित अपराधों में अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक अथवा शारीरिक रूप से दिव्यांग पीड़ित व्यक्ति के लिए अधिक सुरक्षित प्रक्रिया देता है। इसे केवल “दिव्यांग महिला की FIR घर पर दर्ज होगी” कहना अधूरा होगा, क्योंकि कानून ने इसके साथ कई कानूनी सुरक्षाओं को जोड़ा है।
यह विशेष प्रक्रिया उन्हीं निर्धारित अपराधों से जुड़ी है जिनमें BNS की धारा 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 71, 74, 75, 76, 77, 78, 79 और 124 शामिल हैं। यदि इनमें से किसी अपराध के किए जाने या प्रयास किए जाने का आरोप है और जिस व्यक्ति के विरुद्ध अपराध हुआ है वह अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक अथवा शारीरिक रूप से दिव्यांग है, तो अतिरिक्त सुरक्षा लागू होती है।
दिव्यांग पीड़िता की सूचना कहाँ दर्ज की जाएगी?
ऐसी स्थिति में सूचना उस व्यक्ति के निवास पर, जो अपराध की सूचना देना चाहता है, या उसकी पसंद के किसी सुविधाजनक स्थान पर दर्ज की जाएगी। इसलिए इस नियम को केवल “घर पर FIR” कहकर सीमित करना भी सही नहीं है। कानून निवास के साथ पीड़ित व्यक्ति की पसंद के सुविधाजनक स्थान का विकल्प भी देता है।
इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि इन निर्धारित परिस्थितियों में पुलिस थाने तक पहुँचना सूचना दर्ज कराने की अनिवार्य शर्त नहीं है। लेकिन केवल इस कारण कि कोई महिला सामान्य परिस्थितियों में पुलिस थाने नहीं जाना चाहती, यह विशेष प्रावधान अपने-आप लागू नहीं हो जाता। इसके लिए कानून में निर्धारित अपराध और दिव्यांगता से जुड़ी शर्तों का पूरा होना आवश्यक है।
दुभाषिए, विशेष शिक्षक और वीडियो रिकॉर्डिंग की क्या भूमिका है?
ऐसी सूचना, आवश्यकता के अनुसार दुभाषिए (interpreter) या विशेष शिक्षक (special educator) की उपस्थिति में दर्ज की जाएगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मानसिक या शारीरिक दिव्यांगता के कारण पीड़ित व्यक्ति अपनी बात पुलिस तक ठीक प्रकार से पहुँचा सके और संवाद की कठिनाई के कारण उसकी सूचना गलत या अधूरी दर्ज न हो।
इसके साथ BNSS यह भी निर्धारित करता है कि इस प्रकार सूचना दर्ज करने की प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाएगी। इसलिए वीडियो रिकॉर्डिंग केवल सुविधा या पुलिस के विवेक पर निर्भर व्यवस्था नहीं है, बल्कि इस विशेष कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।
निर्धारित अपराध और अस्थायी या स्थायी मानसिक अथवा शारीरिक दिव्यांगता की स्थिति में सूचना दर्ज करने का स्थान, दुभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता और वीडियो रिकॉर्डिंग एक-दूसरे से अलग सुविधाएँ नहीं हैं। BNSS इन्हें पीड़ित व्यक्ति की सूचना ठीक प्रकार से दर्ज करने वाली संयुक्त सुरक्षा व्यवस्था के रूप में रखता है।
FIR के बाद मजिस्ट्रेट के सामने बयान का क्या संबंध है?
BNSS की धारा 173(1) में दी गई विशेष प्रक्रिया सूचना दर्ज होने पर समाप्त नहीं होती। ऐसे मामले में पुलिस अधिकारी को उस व्यक्ति का बयान BNSS की धारा 183(6)(a) के तहत मजिस्ट्रेट से यथाशीघ्र दर्ज करवाना होता है।
यहाँ FIR और मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान के बीच अंतर समझना जरूरी है। धारा 173 पुलिस को अपराध की सूचना देने और उसे दर्ज करने के चरण से संबंधित है, जबकि धारा 183 के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा बयान दर्ज करना अलग कानूनी चरण है। इसलिए मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज करने की पूरी प्रक्रिया इस पेज में शामिल नहीं की जा रही है।
मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान के अलावा जाँच के दौरान पुलिस द्वारा भी पीड़िता का बयान दर्ज किया जा सकता है। अपराध की प्रकृति और पीड़िता की स्थिति के अनुसार महिला पीड़िता का बयान दर्ज करने के विशेष कानूनी नियम लागू हो सकते हैं।
FIR दर्ज करना और जाँच में बयान देना अलग कैसे हैं?
FIR अपराध की प्रारंभिक सूचना को पुलिस के समक्ष कानूनी अभिलेख में लाने का शुरुआती चरण है। FIR के बाद जाँच के दौरान पीड़िता या गवाहों से पूछताछ, मजिस्ट्रेट के सामने बयान और अपराध की प्रकृति के अनुसार अन्य जाँच संबंधी कार्यवाही हो सकती है। इन सभी चरणों को FIR दर्ज करने की प्रक्रिया का हिस्सा समझना सही नहीं है।
उदाहरण के लिए, BNSS की धारा 173(1) में निर्धारित अपराधों की सूचना महिला पुलिस अधिकारी या महिला अधिकारी द्वारा दर्ज करने का नियम प्रारंभिक सूचना दर्ज करने के चरण से संबंधित है। जाँच के दौरान महिला का बयान कहाँ और किस प्रकार दर्ज किया जाएगा, यह अलग कानूनी प्रश्न है।
“अपराध की प्रारंभिक सूचना कौन दर्ज करेगा?” और “जाँच के दौरान महिला का बयान कहाँ और कैसे दर्ज किया जाएगा?” अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। दोनों को मिलाने से FIR और जाँच के दौरान मिलने वाली कानूनी सुरक्षाओं की गलत व्याख्या हो सकती है।
FIR दर्ज होने के बाद उसकी प्रति किसे मिलेगी?
BNSS की धारा 173(2) के अनुसार धारा 173(1) के तहत दर्ज की गई सूचना की प्रति तुरंत और निःशुल्क सूचना देने वाले व्यक्ति या पीड़ित व्यक्ति को दी जाएगी। इसका अर्थ है कि FIR की प्रति देना केवल पुलिस की सुविधा या विवेक पर निर्भर नहीं है और इसके लिए कोई शुल्क देना आवश्यक नहीं है।
यहाँ “सूचना देने वाला व्यक्ति या पीड़ित व्यक्ति” का अंतर भी महत्वपूर्ण है। अपराध की सूचना देने वाला और अपराध से वास्तविक रूप से पीड़ित व्यक्ति हमेशा एक ही हो, यह जरूरी नहीं है। किसी परिस्थिति में सूचना किसी अन्य व्यक्ति ने पुलिस को दी हो सकती है, जबकि अपराध की पीड़िता महिला है। BNSS की धारा 173(2) पीड़ित व्यक्ति को भी निःशुल्क प्रति पाने के अधिकार में स्पष्ट रूप से शामिल करती है।
यदि FIR दर्ज करते समय उसकी प्रति नहीं मिलती या बाद में दोबारा आवश्यकता पड़ती है, तो FIR की कॉपी प्राप्त करने के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यम उपलब्ध हो सकते हैं।
पुलिस FIR की सूचना दर्ज करने से मना करे तो क्या करें?
यदि पुलिस थाने का प्रभारी अधिकारी BNSS की धारा 173(1) में बताई गई सूचना दर्ज करने से मना करता है, तो BNSS की धारा 173(4) पीड़ित व्यक्ति को आगे की कानूनी प्रक्रिया उपलब्ध कराती है। सूचना का सार लिखित रूप में और डाक द्वारा संबंधित पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) को भेजा जा सकता है।
यदि पुलिस अधीक्षक को यह संतोष होता है कि दी गई सूचना से संज्ञेय अपराध का होना प्रकट होता है, तो वह स्वयं मामले की जाँच कर सकता है या अपने अधीनस्थ पुलिस अधिकारी को जाँच करने का निर्देश दे सकता है। इसके बाद कानून मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने का उपाय भी उपलब्ध रखता है।
यह व्यवस्था केवल महिलाओं के मामलों तक सीमित नहीं है। पुलिस द्वारा सूचना दर्ज न किए जाने पर पुलिस अधीक्षक के समक्ष शिकायत और उसके बाद परिस्थितियों के अनुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन जैसे FIR न लेने पर कानूनी उपाय उपलब्ध हो सकते हैं।
क्या कुछ मामलों में FIR की सूचना दर्ज न करना लोक सेवक के लिए अपराध भी है?
हाँ, लेकिन प्रत्येक FIR दर्ज न करने के मामले को इस श्रेणी में रखना गलत होगा। BNS की धारा 199(c) कुछ विशेष रूप से निर्धारित संज्ञेय अपराधों से संबंधित सूचना को BNSS की धारा 173(1) के अनुसार दर्ज न करने वाले लोक सेवक के लिए अलग आपराधिक जिम्मेदारी का प्रावधान करती है।
BNS की धारा 199(c) में BNS की धारा 64, 65, 66, 67, 68, 70, 71, 74, 76, 77, 79, 124, 143 और 144 का उल्लेख है। कानून में निर्धारित शर्तें पूरी होने पर इन अपराधों से संबंधित सूचना दर्ज करने में विफल रहने वाले लोक सेवक को छह महीने से कम नहीं और दो वर्ष तक के कठोर कारावास तथा जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
BNSS धारा 173(1) में महिला अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज करने वाला विशेष प्रावधान:
BNS धारा 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 71, 74, 75, 76, 77, 78, 79 और 124।
BNS धारा 199(c) में लोक सेवक की आपराधिक जिम्मेदारी:
BNS धारा 64, 65, 66, 67, 68, 70, 71, 74, 76, 77, 79, 124, 143 और 144।
इसलिए दोनों प्रावधानों की सूचियों को एक-दूसरे के स्थान पर लागू नहीं किया जा सकता।
इस अंतर का सीधा कानूनी प्रभाव है। BNS की धारा 69, 75 और 78 BNSS की धारा 173(1) में महिला अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज करने वाली सूची में हैं, लेकिन BNS की धारा 199(c) की सूची में नहीं हैं। दूसरी ओर BNS की धारा 143 और 144, BNS की धारा 199(c) में हैं लेकिन BNSS की धारा 173(1) में महिला अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज करने वाली सूची में नहीं हैं।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि जिस प्रत्येक मामले में महिला अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज की जानी चाहिए, उसे दर्ज न करने पर BNS की धारा 199(c) अपने-आप लागू हो जाएगी। दोनों धाराओं की शर्तें अलग-अलग देखकर ही उनकी कानूनी स्थिति तय की जाएगी।
महिला अपराध की FIR में सामान्य और विशेष नियमों को कैसे समझें?
महिला अपराध की FIR से जुड़े नियमों को समझने का सही तरीका यह है कि पहले सामान्य FIR नियम और फिर महिला पीड़िता से जुड़े विशेष नियम अलग किए जाएँ। घटना के क्षेत्र की परवाह किए बिना संज्ञेय अपराध की सूचना देना, मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देना और सूचना देने वाले या पीड़ित व्यक्ति को FIR की निःशुल्क प्रति मिलना सामान्य FIR व्यवस्था का हिस्सा है। ये अधिकार केवल महिलाओं तक सीमित नहीं हैं।
इसके बाद BNSS की धारा 173(1) कुछ निर्धारित अपराधों में अतिरिक्त सुरक्षा जोड़ती है। ऐसे मामलों में सूचना महिला पुलिस अधिकारी या महिला अधिकारी द्वारा दर्ज की जाती है। निर्धारित अपराध के साथ अस्थायी या स्थायी मानसिक अथवा शारीरिक दिव्यांगता की स्थिति होने पर सूचना दर्ज करने का स्थान, दुभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता, वीडियो रिकॉर्डिंग और मजिस्ट्रेट के सामने बयान से जुड़ी अतिरिक्त सुरक्षा भी लागू होती है।
इसलिए “महिला अपराध की FIR” को एक ही विशेष प्रक्रिया मानना सही नहीं है। पहले अपराध की प्रकृति और पीड़िता की परिस्थितियों को देखना होगा और उसके बाद यह तय होगा कि सामान्य FIR प्रक्रिया के साथ कौन-सी अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा लागू होती है।
मुख्य बातें (Key Takeaways)
- महिला के विरुद्ध संज्ञेय अपराध की FIR कोई अलग प्रकार की FIR नहीं है; सामान्य FIR प्रक्रिया के साथ कुछ मामलों में अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा लागू होती है।
- BNSS की धारा 173(1) के अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना घटना के क्षेत्र की परवाह किए बिना पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को दी जा सकती है।
- हर महिला की FIR महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज होना सामान्य नियम नहीं है। यह विशेष व्यवस्था BNSS की धारा 173(1) में बताए गए निर्धारित BNS अपराधों से जुड़ी है।
- निर्धारित अपराध पूरा होने के साथ उसका प्रयास किए जाने की सूचना पर भी महिला अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज करने वाला विशेष नियम लागू हो सकता है।
- संज्ञेय अपराध की सूचना मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी जा सकती है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी गई सूचना के मामले में तीन दिनों के भीतर हस्ताक्षर करना महत्वपूर्ण कानूनी आवश्यकता है।
- निर्धारित अपराधों में अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक अथवा शारीरिक रूप से दिव्यांग पीड़ित व्यक्ति के लिए निवास या पसंद के सुविधाजनक स्थान पर सूचना दर्ज करने, दुभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता और वीडियो रिकॉर्डिंग की विशेष व्यवस्था है।
- ऐसे मामले में BNSS की धारा 183(6)(a) के तहत मजिस्ट्रेट से यथाशीघ्र बयान दर्ज करवाने का भी प्रावधान है, लेकिन यह FIR से अलग कानूनी चरण है।
- BNSS की धारा 173(2) के अनुसार दर्ज सूचना की प्रति सूचना देने वाले व्यक्ति या पीड़ित व्यक्ति को तुरंत और निःशुल्क दी जानी है।
- सूचना दर्ज न किए जाने पर BNSS की धारा 173(4) आगे का कानूनी उपाय देती है, जबकि BNS की धारा 199(c) केवल उसमें बताए गए विशेष अपराधों में लोक सेवक की अलग आपराधिक जिम्मेदारी से संबंधित है।
- BNSS की धारा 173(1) में महिला अधिकारी से संबंधित अपराधों की सूची और BNS की धारा 199(c) में लोक सेवक की आपराधिक जिम्मेदारी वाली सूची समान नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. क्या महिला किसी भी पुलिस थाने में FIR दर्ज करा सकती है?
संज्ञेय अपराध की सूचना अपराध के स्थान की परवाह किए बिना पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को दी जा सकती है। यदि घटना उस थाने के क्षेत्राधिकार की नहीं है, तो आगे संबंधित पुलिस थाने को मामला भेजने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
2. क्या महिला की FIR केवल महिला पुलिस अधिकारी ही दर्ज कर सकती है?
नहीं। यह नियम महिला द्वारा दी जाने वाली हर FIR पर लागू नहीं होता। BNSS की धारा 173(1) में बताए गए निर्धारित BNS अपराधों के मामले में सूचना महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा दर्ज की जानी है।
3. क्या FIR दर्ज कराने के लिए महिला का स्वयं पुलिस थाने जाना जरूरी है?
हर मामले में नहीं। संज्ञेय अपराध की सूचना इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी दी जा सकती है। इसके अतिरिक्त निर्धारित अपराधों में अस्थायी या स्थायी मानसिक अथवा शारीरिक दिव्यांगता वाले पीड़ित व्यक्ति की सूचना उसके निवास या उसकी पसंद के सुविधाजनक स्थान पर दर्ज करने की विशेष व्यवस्था है।
4. क्या ई-मेल या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से शिकायत भेजते ही FIR दर्ज हो जाती है?
केवल इलेक्ट्रॉनिक सूचना भेजने और FIR की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने को एक नहीं समझना चाहिए। BNSS की धारा 173(1)(ii) के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी गई सूचना को सूचना देने वाले व्यक्ति द्वारा तीन दिनों के भीतर हस्ताक्षरित किए जाने पर अभिलेख में लिया जाता है।
5. क्या दूसरे जिले या राज्य में भी FIR दर्ज कराई जा सकती है?
हाँ। संज्ञेय अपराध की सूचना केवल उसी जिले या राज्य के पुलिस थाने में देने की बाध्यता नहीं है जहाँ अपराध हुआ था। अपराध के स्थान की परवाह किए बिना पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को सूचना दी जा सकती है।
6. क्या FIR की प्रति लेने के लिए पैसे देने पड़ते हैं?
नहीं। BNSS की धारा 173(2) के अनुसार दर्ज की गई सूचना की प्रति सूचना देने वाले व्यक्ति या पीड़ित व्यक्ति को तुरंत और निःशुल्क दी जानी है।
7. पुलिस महिला की FIR दर्ज न करे तो क्या किया जा सकता है?
BNSS की धारा 173(4) के तहत सूचना का सार लिखित रूप में संबंधित पुलिस अधीक्षक को भेजा जा सकता है। निर्धारित परिस्थितियों में इसके बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने का कानूनी उपाय भी उपलब्ध है।
8. क्या महिला की FIR दर्ज न करने पर पुलिस अधिकारी को सजा हो सकती है?
हर FIR दर्ज न करने पर BNS की धारा 199(c) लागू नहीं होती। यह प्रावधान केवल उसमें विशेष रूप से बताए गए अपराधों से संबंधित सूचना दर्ज न करने की स्थिति में, निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी होने पर लागू हो सकता है।
निष्कर्ष
महिला के विरुद्ध संज्ञेय अपराध की FIR में सामान्य FIR प्रक्रिया के साथ कुछ परिस्थितियों में विशेष कानूनी सुरक्षा भी लागू होती है। इनका लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि कथित अपराध कौन-सा है और पीड़िता की स्थिति क्या है। इसलिए हर महिला की FIR के लिए एक जैसी विशेष प्रक्रिया मानना सही नहीं है।
BNSS की धारा 173 में निर्धारित अपराधों के लिए महिला अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज करने तथा मानसिक या शारीरिक रूप से दिव्यांग पीड़िता के लिए स्थान, दुभाषिए या विशेष शिक्षक और वीडियो रिकॉर्डिंग जैसी अतिरिक्त व्यवस्थाएँ इसी उद्देश्य से दी गई हैं। साथ ही क्षेत्राधिकार, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना, FIR की निःशुल्क प्रति और सूचना दर्ज न किए जाने पर उपलब्ध उपाय सामान्य FIR व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।