किसी भी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की आपराधिक न्याय प्रक्रिया (Criminal Justice Process) सामान्यतः प्रथम सूचना रिपोर्ट (First Information Report - FIR) से प्रारम्भ होती है। यही वह विधिक दस्तावेज है जिसके आधार पर पुलिस को अपराध की जांच प्रारम्भ करने, साक्ष्य एकत्रित करने तथा आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त होता है। इसलिए FIR केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली का प्रवेश द्वार (Gateway to Criminal Justice System) मानी जाती है।

पहले FIR दर्ज करने की व्यवस्था दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 154 में थी, लेकिन 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के बाद यह व्यवस्था अब BNSS की धारा 173 के अंतर्गत संचालित होती है। यद्यपि मूल सिद्धांत लगभग समान है, फिर भी नई संहिता में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देने, सूचना के अभिलेखीकरण तथा पीड़ित के अधिकारों से संबंधित कई महत्वपूर्ण प्रावधानों को अधिक स्पष्ट रूप से व्यवस्थित किया गया है।

इस विस्तृत मार्गदर्शिका (Complete Legal Guide) में हम FIR की कानूनी परिभाषा, BNSS की धारा 173 के प्रमुख प्रावधान, संज्ञेय अपराध, FIR और सामान्य शिकायत का अंतर, Zero FIR, Online FIR, FIR दर्ज होने के बाद की प्रक्रिया, उपलब्ध कानूनी उपाय तथा सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णयों को सरल एवं प्रामाणिक भाषा में समझेंगे।

प्रथम सूचना रिपोर्ट (First Information Report - FIR) वह प्रथम आधिकारिक अभिलेख (Official Record) है, जिसे पुलिस किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की सूचना प्राप्त होने पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 के अनुसार विधिवत दर्ज करती है।

सरल शब्दों में कहें तो जब किसी व्यक्ति द्वारा ऐसे अपराध की सूचना पुलिस को दी जाती है जिसमें पुलिस बिना मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के जांच प्रारम्भ कर सकती है, तब उस सूचना को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार FIR के रूप में दर्ज किया जाता है।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि FIR स्वयं अपराध का प्रमाण (Evidence) नहीं होती। इसका उद्देश्य केवल अपराध की प्रारम्भिक सूचना का आधिकारिक अभिलेखीकरण करना है, ताकि पुलिस विधि के अनुसार जांच प्रारम्भ कर सके। किसी व्यक्ति का दोष या निर्दोष होना केवल जांच और न्यायालयीन विचारण (Trial) के बाद ही निर्धारित होता है।

भारत में FIR दर्ज करने का कानूनी आधार पहले दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 154 थी। हालांकि 1 जुलाई 2024 से नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद यह व्यवस्था अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 के अंतर्गत संचालित होती है।

BNSS की धारा 173 संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की सूचना प्राप्त होने पर उसे विधिवत अभिलेखित करने, शिकायतकर्ता को उसकी प्रति उपलब्ध कराने तथा आवश्यक परिस्थितियों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना स्वीकार करने जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का कानूनी आधार प्रदान करती है।

BNSS धारा 173 का आधिकारिक शीर्षक: Information in Cognizable Cases


BNSS की धारा 173 का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संज्ञेय अपराध की सूचना प्राप्त होने पर उसे विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अभिलेखित किया जाए, ताकि पुलिस बिना अनावश्यक विलंब के जांच प्रारम्भ कर सके।

इस प्रावधान का उद्देश्य केवल FIR दर्ज कराना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस अपनी वैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन करे। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि जहाँ संज्ञेय अपराध प्रथम दृष्टया प्रकट होता है, वहाँ FIR दर्ज करना सामान्य नियम है।

संज्ञेय अपराध क्या होता है?

FIR मुख्य रूप से संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की सूचना से संबंधित होती है। संज्ञेय अपराध वह अपराध है जिसमें पुलिस कानून के अनुसार बिना मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के जांच शुरू कर सकती है और निर्धारित परिस्थितियों में बिना वारंट गिरफ्तारी की शक्ति भी रखती है।

संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) वह अपराध है जिसमें पुलिस, BNSS के प्रावधानों के अनुसार, प्रथम सूचना प्राप्त होते ही विधिक जांच प्रारम्भ कर सकती है।

हत्या, बलात्कार, अपहरण और डकैती जैसे गंभीर अपराध सामान्य उदाहरण हैं। हालांकि किसी अपराध का संज्ञेय या असंज्ञेय होना संबंधित कानून और लागू प्रावधानों पर निर्भर करता है।

उपरोक्त केवल सामान्य उदाहरण हैं। किसी अपराध का संज्ञेय अथवा असंज्ञेय होना संबंधित अधिनियम एवं लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करता है। इसलिए प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और लागू कानून के आधार पर किया जाता है।

FIR की प्रमुख विशेषताएँ

FIR केवल सूचना दर्ज करने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह आपराधिक न्याय प्रक्रिया की आधारशिला है। इसकी कुछ विशेषताएँ इसे सामान्य शिकायत से अलग बनाती हैं।

  • यह केवल संज्ञेय अपराधों से संबंधित होती है।
  • इसी के आधार पर पुलिस जांच प्रारम्भ करती है।
  • FIR दर्ज होने पर एक विशिष्ट FIR नंबर आवंटित किया जाता है।
  • शिकायतकर्ता को इसकी प्रमाणित प्रति निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती है।
  • इसे न्यायालय में संदर्भ दस्तावेज (Reference Document) के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
  • यह किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं होती।

इन्हीं विशेषताओं के कारण FIR को भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण प्रारम्भिक दस्तावेज माना जाता है।

FIR क्यों महत्वपूर्ण होती है?

FIR संज्ञेय अपराध की सूचना को आधिकारिक रूप से दर्ज करती है और आपराधिक जांच की प्रारंभिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार बनती है। इसके बाद पुलिस कानून के अनुसार जांच, साक्ष्य संकलन और अन्य आवश्यक कार्रवाई कर सकती है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि FIR दर्ज होना किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं है। दोष या निर्दोषता का अंतिम निर्णय न्यायालय करता है।

FIR कौन दर्ज करवा सकता है?

FIR केवल अपराध का पीड़ित ही दर्ज नहीं करवा सकता। किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी पुलिस को इसकी सूचना दे सकता है। इसमें पीड़ित, उसका परिवार, प्रत्यक्षदर्शी या घटना की विश्वसनीय जानकारी रखने वाला अन्य व्यक्ति शामिल हो सकता है।

इसलिए FIR का मूल उद्देश्य यह देखना नहीं है कि सूचना कौन दे रहा है, बल्कि यह है कि दी गई सूचना से संज्ञेय अपराध का मामला सामने आता है या नहीं। इससे संबंधित पात्रता FIR कौन दर्ज कर सकता है में अलग से स्पष्ट की गई है।

FIR का उद्देश्य अपराध की सूचना को विधिवत दर्ज करना है, न कि केवल पीड़ित का बयान लेना। इसलिए कई परिस्थितियों में घटना का प्रत्यक्षदर्शी, परिवार का सदस्य अथवा घटना की जानकारी रखने वाला अन्य व्यक्ति भी FIR दर्ज कराने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर सकता है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने की कानूनी व्यवस्था प्रदान करती है। सूचना मौखिक रूप से दिए जाने पर उसे लिखित रूप में दर्ज किया जाता है और सूचना देने वाले व्यक्ति को पढ़कर सुनाया जाता है।

धारा 173 इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देने की व्यवस्था को भी मान्यता देती है, जिसके लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया और औपचारिकताओं का पालन आवश्यक होता है।

FIR दर्ज होने के बाद सूचना देने वाले या पीड़ित व्यक्ति को उसकी प्रति निःशुल्क उपलब्ध कराने का भी प्रावधान है। कुछ विशेष अपराधों और पीड़ितों के मामलों में सूचना दर्ज करने के लिए अतिरिक्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा भी निर्धारित की गई है।

इस प्रकार, धारा 173 FIR दर्ज करने की मूल वैधानिक प्रक्रिया तथा उससे जुड़े महत्वपूर्ण अधिकारों और पुलिस के कर्तव्यों का आधार है।

यदि संज्ञेय अपराध की सूचना प्राप्त होती है, तो सामान्यतः पुलिस अधिकारी का पहला कानूनी दायित्व उस सूचना को विधि अनुसार अभिलेखित करना होता है।

धारा 173 का उद्देश्य केवल रिकॉर्ड तैयार करना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अपराध की सूचना प्राप्त होने के बाद जांच प्रक्रिया बिना अनावश्यक विलंब के प्रारम्भ हो तथा शिकायतकर्ता को कानून द्वारा प्रदत्त अधिकारों का लाभ मिल सके।

FIR और सामान्य शिकायत में अंतर

FIR और सामान्य शिकायत एक ही चीज नहीं हैं। FIR मुख्य रूप से ऐसी सूचना से संबंधित है जिससे संज्ञेय अपराध का पता चलता है और जिसके आधार पर पुलिस कानून के अनुसार जांच शुरू कर सकती है।

इसके विपरीत, पुलिस को दी गई प्रत्येक शिकायत स्वतः FIR नहीं बन जाती। शिकायत पर आगे की प्रक्रिया अपराध की प्रकृति और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करती है। दोनों प्रक्रियाओं के अंतर को FIR और शिकायत के अंतर में अलग से समझाया गया है।

सरल शब्दों में कहें तो FIR आपराधिक जांच की औपचारिक शुरुआत करती है, जबकि सामान्य शिकायत हमेशा पुलिस जांच प्रारम्भ करने का अधिकार प्रदान नहीं करती।

व्यवहारिक रूप से सबसे अधिक भ्रम इसी विषय को लेकर होता है। कई लोग यह मान लेते हैं कि पुलिस के पास दी गई प्रत्येक लिखित शिकायत स्वतः FIR बन जाती है, जबकि वास्तविकता यह है कि FIR केवल उन्हीं मामलों में दर्ज की जाती है जहाँ प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है। इसलिए किसी शिकायत का FIR में परिवर्तित होना उसके विषय, तथ्यों तथा लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करता है।

क्या प्रत्येक शिकायत पर FIR दर्ज की जाती है?

नहीं। प्रत्येक शिकायत (Complaint) पर FIR दर्ज नहीं की जाती। यह इस बात पर निर्भर करता है कि शिकायत में वर्णित तथ्य प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) को प्रकट करते हैं या नहीं। यदि सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो सामान्यतः BNSS की धारा 173 के अनुसार FIR दर्ज की जाती है।

प्रत्येक FIR एक शिकायत पर आधारित हो सकती है, लेकिन प्रत्येक शिकायत FIR नहीं होती।

पुलिस का यह अधिकार नहीं है कि वह प्रत्येक संज्ञेय अपराध की सूचना को मनमाने ढंग से सामान्य शिकायत मानकर दर्ज करे। यदि सूचना से संज्ञेय अपराध स्पष्ट रूप से प्रकट होता है, तो कानून के अनुसार उचित कार्रवाई अपेक्षित होती है। वहीं यदि प्रारम्भिक तथ्यों से संज्ञेय अपराध नहीं बनता, तो मामले की प्रकृति के अनुसार अन्य वैधानिक प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

केवल इस आधार पर कि पुलिस ने आपकी शिकायत प्राप्त कर ली है, यह मान लेना उचित नहीं होगा कि FIR भी दर्ज हो चुकी है। शिकायत संख्या (Complaint Number) और FIR संख्या (FIR Number) अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए शिकायत दर्ज कराने के बाद यह अवश्य सुनिश्चित करें कि FIR वास्तव में दर्ज हुई है या नहीं।

Zero FIR क्या होती है?

यदि संज्ञेय अपराध किसी दूसरे थाना क्षेत्र में हुआ हो, तो केवल क्षेत्राधिकार के कारण पीड़ित को संबंधित थाने तक भेजना आवश्यक नहीं है। उपयुक्त परिस्थितियों में पुलिस पहले Zero FIR दर्ज कर सकती है और बाद में उसे क्षेत्राधिकार वाले पुलिस स्टेशन को भेज सकती है।

Zero FIR का उद्देश्य अपराध की सूचना दर्ज करने में केवल territorial jurisdiction के कारण होने वाली देरी को कम करना है।

Zero FIR का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) के कारण किसी पीड़ित को तत्काल कानूनी सहायता से वंचित न होना पड़े।

क्या Online FIR दर्ज की जा सकती है?

BNSS इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से संज्ञेय अपराध की सूचना देने की व्यवस्था को मान्यता देता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों और पुलिस संगठनों की ऑनलाइन शिकायत या e-FIR सुविधाएँ भी उपलब्ध हो सकती हैं।

हालांकि Online Complaint, electronic information और e-FIR को हर स्थिति में एक ही प्रक्रिया नहीं समझना चाहिए। उपलब्ध सुविधा और उसकी प्रक्रिया संबंधित राज्य या पुलिस व्यवस्था पर निर्भर कर सकती है।

Online FIR ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से नागरिक इंटरनेट के द्वारा निर्धारित पोर्टल अथवा राज्य पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर अपराध की सूचना दर्ज करा सकता है।

यदि मामला साइबर वित्तीय धोखाधड़ी (Cyber Financial Fraud) से संबंधित है, तो राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करने के साथ-साथ 1930 हेल्पलाइन पर तुरंत संपर्क करना धन की रिकवरी की संभावना बढ़ा सकता है।

FIR दर्ज होने के बाद क्या प्रक्रिया होती है?

FIR दर्ज होने के बाद पुलिस मामले की प्रकृति और कानून के अनुसार जांच आगे बढ़ाती है। इस दौरान साक्ष्य एकत्र किए जा सकते हैं, संबंधित व्यक्तियों के बयान लिए जा सकते हैं और आवश्यकता के अनुसार अन्य वैधानिक कार्रवाई की जा सकती है।

जांच पूरी होने के बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पुलिस सक्षम न्यायालय के समक्ष कानून के अनुसार उपयुक्त रिपोर्ट प्रस्तुत करती है।

FIR दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी दोषी सिद्ध हो गया है। इसके बाद निष्पक्ष जांच, साक्ष्य संकलन तथा न्यायालयीन प्रक्रिया के आधार पर ही मामले का अंतिम परिणाम तय होता है।

यदि पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें?

यदि दी गई सूचना से संज्ञेय अपराध का मामला सामने आता है और पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो BNSS में आगे के वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं। परिस्थितियों के अनुसार संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष मामला उठाया जा सकता है।

इन उपायों की प्रक्रिया अलग कानूनी विषय है और प्रत्येक विकल्प के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक होता है।

यदि पुलिस आपकी शिकायत प्राप्त करने के बाद भी FIR दर्ज नहीं करती, तो केवल मौखिक आश्वासन पर निर्भर न रहें। शिकायत की प्राप्ति का प्रमाण सुरक्षित रखें और उपलब्ध कानूनी उपायों का उपयोग करें।

FIR से संबंधित कानून को समझने के लिए केवल BNSS की धारा 173 पढ़ना पर्याप्त नहीं है। समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं, जिन्होंने यह स्पष्ट किया है कि FIR कब दर्ज की जानी चाहिए, पुलिस की क्या जिम्मेदारी है तथा नागरिकों के क्या अधिकार हैं। इन निर्णयों ने FIR से संबंधित भारतीय विधि को व्यावहारिक रूप से विकसित किया है।

यदि किसी कानूनी विषय पर Bare Act और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को साथ पढ़ा जाए, तभी उस विषय की सही कानूनी समझ विकसित होती है।

1. Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh (2013)

FIR से संबंधित यह सर्वोच्च न्यायालय का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जाता है। संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि प्राप्त सूचना से प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो सामान्यतः FIR दर्ज करना अनिवार्य है।

इस निर्णय ने पुलिस के विवेकाधिकार (Discretion) की सीमा स्पष्ट कर दी। अब केवल इस आधार पर कि पुलिस पहले जांच करना चाहती है, प्रत्येक मामले में FIR दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि न्यायालय ने कुछ विशेष परिस्थितियों में सीमित प्रारम्भिक जांच (Preliminary Inquiry) की अनुमति भी स्वीकार की।

2. State of Haryana v. Bhajan Lal (1992)

यह निर्णय FIR से अधिक आपराधिक कार्यवाही की वैधता से संबंधित है, लेकिन FIR कानून के विकास में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे सिद्धांत निर्धारित किए जिनके आधार पर यह देखा जा सकता है कि किन परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही न्यायालय द्वारा निरस्त की जा सकती है।

इस निर्णय से यह सिद्धांत स्थापित हुआ कि FIR दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक मामले में मुकदमा अंत तक चलेगा। यदि मामला कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।

3. Ramesh Kumari v. State (NCT of Delhi)

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जहाँ संज्ञेय अपराध की सूचना प्राप्त होती है, वहाँ पुलिस का प्राथमिक दायित्व FIR दर्ज करना है।

इस निर्णय ने नागरिकों के उस अधिकार को मजबूत किया जिसके अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना को बिना उचित कारण अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

गलत धारणा सही तथ्य
FIR दर्ज होते ही आरोपी अपराधी मान लिया जाता है। FIR केवल जांच की शुरुआत है। दोष सिद्ध करना न्यायालय का कार्य है।
FIR केवल पीड़ित ही दर्ज करवा सकता है। घटना की जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति संज्ञेय अपराध की सूचना दे सकता है।
हर शिकायत FIR बन जाती है। केवल संज्ञेय अपराध की सूचना सामान्यतः FIR के रूप में दर्ज होती है।
दूसरे थाना क्षेत्र का मामला हो तो FIR दर्ज नहीं हो सकती। ऐसी स्थिति में Zero FIR दर्ज की जा सकती है।

मुख्य बातें (Key Takeaways)

📌 एक नज़र में
  • FIR केवल संज्ञेय अपराधों में दर्ज की जाती है।
  • वर्तमान में FIR का कानूनी आधार BNSS, 2023 की धारा 173 है।
  • FIR किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं होती।
  • Zero FIR किसी भी थाने में दर्ज कराई जा सकती है।
  • Online FIR की सुविधा प्रत्येक राज्य में अलग-अलग हो सकती है।
  • यदि पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो नागरिक के पास वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों ने FIR संबंधी कानून को और स्पष्ट किया है।
  • FIR केवल जांच प्रारम्भ करने का कानूनी आधार है, यह किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं है।

FIR से जुड़े अधिकतर विवाद जानकारी के अभाव से उत्पन्न होते हैं। यदि नागरिक FIR, शिकायत, Zero FIR और पुलिस जांच की सीमाओं को सही रूप से समझ लें, तो वे अपने अधिकारों का अधिक प्रभावी उपयोग कर सकते हैं।

निष्कर्ष

FIR (First Information Report) संज्ञेय अपराध की सूचना को पुलिस के समक्ष औपचारिक रूप से दर्ज करने की महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रिया है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 173 इस संबंध में मूल वैधानिक व्यवस्था प्रदान करती है।

FIR का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि संज्ञेय अपराध की सूचना को दर्ज करके कानून के अनुसार जांच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। FIR स्वयं दोषसिद्धि का प्रमाण नहीं होती और मामले में दोष या निर्दोषता का अंतिम निर्णय न्यायालय करता है।

इसलिए FIR को केवल एक पुलिस दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि आपराधिक न्याय प्रक्रिया के प्रारंभिक और महत्वपूर्ण चरण के रूप में समझना चाहिए।

FAQ Section

क्या FIR किसी व्यक्ति के अपराधी होने का प्रमाण होती है?

नहीं। FIR केवल संज्ञेय अपराध की प्रथम सूचना का आधिकारिक रिकॉर्ड होती है। किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करने का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय को है।

क्या FIR की कॉपी मुफ्त मिलती है?

हाँ। कानून के अनुसार FIR दर्ज होने के बाद शिकायतकर्ता को उसकी प्रति निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती है।

क्या FIR दर्ज कराने की कोई समय सीमा होती है?

सामान्यतः FIR दर्ज कराने के लिए कोई निश्चित समय सीमा निर्धारित नहीं है। हालांकि अनावश्यक विलंब होने पर उसके कारणों की जांच अथवा मूल्यांकन किया जा सकता है। इसलिए यथाशीघ्र सूचना देना उचित माना जाता है।

क्या गुमनाम व्यक्ति FIR दर्ज करा सकता है?

सामान्यतः FIR में शिकायतकर्ता का विवरण दर्ज किया जाता है। किन्तु कुछ विशेष परिस्थितियों में कानून एवं प्रशासनिक प्रक्रिया अलग हो सकती है।

क्या FIR हिंदी में दर्ज करवाई जा सकती है?

हाँ। FIR उस भाषा में दर्ज की जा सकती है जिसे शिकायतकर्ता समझता हो। आवश्यकता होने पर पुलिस अधिकारी उसे पढ़कर भी सुनाता है।

क्या पुलिस दर्ज की गई FIR को रद्द कर सकती है?

FIR दर्ज होने के बाद पुलिस जांच करती है। जांच के परिणाम के आधार पर न्यायालय में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है। FIR को मनमाने ढंग से समाप्त नहीं किया जा सकता।

क्या FIR दर्ज कराने के लिए वकील होना आवश्यक है?

नहीं। कोई भी नागरिक स्वयं पुलिस के पास जाकर FIR दर्ज कराने का अनुरोध कर सकता है।

क्या बिना सबूत के भी FIR दर्ज हो सकती है?

हाँ। FIR दर्ज कराने के लिए प्रत्येक मामले में प्रारम्भिक स्तर पर सभी साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं होता। FIR के बाद पुलिस जांच के दौरान साक्ष्य एकत्रित किए जाते हैं।