पुलिस को संज्ञेय अपराध की सूचना देने के बाद भी FIR तुरंत दर्ज न हो, तो क्या केवल कुछ दिन बीत जाना ही पुलिस की गलती साबित करता है? या कुछ मामलों में पुलिस FIR से पहले प्रारंभिक जांच भी कर सकती है?

इसका उत्तर केवल शिकायत और FIR की तारीखों का अंतर देखकर नहीं दिया जा सकता। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 173 में कुछ निर्धारित मामलों के लिए प्रारंभिक जांच की व्यवस्था है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि पुलिस को सूचना कब मिली, FIR दर्ज होने तक उसने क्या किया और उस देरी के लिए कानून में कोई आधार था या नहीं।

FIR दर्ज करने में पुलिस की देरी कैसे तय होगी?

पुलिस की ओर से हुई देरी को समझने के लिए सबसे पहले यह तय करना होगा कि संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को कब मिली। घटना की तारीख और FIR की तारीख के बीच का पूरा अंतर पुलिस की देरी नहीं माना जा सकता।

मान लीजिए घटना 1 तारीख को हुई, शिकायत 5 तारीख को पुलिस को दी गई और FIR 9 तारीख को दर्ज हुई। यहाँ पुलिस की ओर से हुई देरी का प्रश्न 5 तारीख से शुरू होगा, क्योंकि पुलिस को सूचना इसी दिन दी गई थी। घटना के बाद शिकायत देने में लगे पहले चार दिनों का प्रश्न FIR दर्ज कराने में देरी के प्रभाव से संबंधित होगा।

इसलिए केवल यह कहना कि “FIR आठ दिन बाद दर्ज हुई” पर्याप्त नहीं है। पहले यह पता करना होगा कि पुलिस को सूचना किस तारीख को मिली और उसके बाद FIR दर्ज होने तक क्या कार्रवाई हुई।

पुलिस की देरी का सही आधार

घटना की तारीख → पुलिस को सूचना मिलने की तारीख → FIR से पहले की पुलिस कार्रवाई → FIR दर्ज होने की तारीख।
पुलिस की जिम्मेदारी समझने के लिए मुख्य रूप से सूचना मिलने और FIR दर्ज होने के बीच की अवधि महत्वपूर्ण है।

क्या पुलिस FIR दर्ज करने से पहले शिकायत की जांच कर सकती है?

हर संज्ञेय अपराध की शिकायत को यह कहकर लंबित नहीं रखा जा सकता कि “पहले जांच करेंगे, फिर FIR दर्ज करेंगे।” लेकिन BNSS की धारा 173(3) कुछ निर्धारित मामलों में FIR से पहले प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry) की अनुमति देती है।

यह व्यवस्था ऐसे संज्ञेय अपराध से संबंधित सूचना पर लागू हो सकती है जिसमें सजा तीन वर्ष या उससे अधिक, लेकिन सात वर्ष से कम है। थाना प्रभारी को अपराध की प्रकृति और गंभीरता पर विचार करना होता है और कम-से-कम पुलिस उप अधीक्षक (DySP) स्तर के अधिकारी की पूर्व अनुमति आवश्यक होती है।

इसके बाद कानून दो विकल्प देता है—यदि प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो जांच शुरू की जा सकती है; या यह पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच की जा सकती है कि मामले में आगे कार्यवाही करने के लिए प्रथम दृष्टया आधार मौजूद है या नहीं।

कानूनी आधार — BNSS धारा 173(3)

तीन वर्ष या उससे अधिक लेकिन सात वर्ष से कम सजा वाले संज्ञेय अपराध में, अपराध की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए तथा DySP या उससे ऊपर के अधिकारी की पूर्व अनुमति से प्रारंभिक जांच की जा सकती है। ऐसी प्रारंभिक जांच 14 दिन के भीतर की जानी है।

क्या पुलिस हर शिकायत को 14 दिन तक रोक सकती है?

नहीं। BNSS में ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं है कि संज्ञेय अपराध की प्रत्येक शिकायत मिलने के बाद पुलिस को FIR दर्ज करने के लिए 14 दिन मिलते हैं।

धारा 173(3) में दिए गए 14 दिन केवल उस प्रारंभिक जांच से जुड़े हैं जो उसी provision की शर्तें पूरी होने पर की जाती है। इसलिए “FIR 14 दिन के भीतर दर्ज हुई” और “FIR दर्ज करने में हुई देरी कानून के अनुसार थी”—ये दोनों अलग बातें हैं।

उदाहरण के लिए, शिकायत 1 तारीख को दी गई और FIR 10 तारीख को दर्ज हुई। केवल यह देखकर कि अभी 14 दिन पूरे नहीं हुए थे, यह नहीं कहा जा सकता कि पुलिस के पास FIR रोकने का अधिकार था। पहले यह देखना होगा कि उस मामले में धारा 173(3) के तहत प्रारंभिक जांच की जा सकती थी या नहीं।

14 दिन सामान्य waiting period नहीं है

पुलिस प्रत्येक संज्ञेय शिकायत को 14 दिन तक लंबित नहीं रख सकती। यह अवधि केवल धारा 173(3) के तहत होने वाली प्रारंभिक जांच से संबंधित है।

प्रारंभिक जांच के नाम पर पुलिस क्या कर सकती है?

प्रारंभिक जांच का उद्देश्य आरोपी को दोषी या निर्दोष घोषित करना नहीं है। धारा 173(3) में इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि मामले में आगे कार्यवाही करने के लिए प्रथम दृष्टया आधार मौजूद है या नहीं।

इसलिए FIR से पहले की प्रारंभिक जांच और FIR के बाद होने वाली विस्तृत पुलिस जांच को एक नहीं माना जा सकता। FIR के बाद पुलिस गवाहों, दस्तावेजों, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और दूसरे साक्ष्यों की विस्तृत जांच कर सकती है।

यदि FIR दर्ज न करने का कारण यह बताया जाए कि पुलिस पहले शिकायत के हर आरोप, हर दस्तावेज और पूरे विवाद की अंतिम सच्चाई तय कर रही थी, तो यह प्रश्न उठ सकता है कि यह वास्तव में धारा 173(3) वाली सीमित प्रारंभिक जांच थी या FIR से पहले ही उससे अधिक व्यापक जांच की जा रही थी।

प्रारंभिक जांच बताई जाए तो किन बातों को देखना चाहिए?

किसी मामले में FIR देर से दर्ज हुई और पुलिस उसका कारण प्रारंभिक जांच बताती है, तो केवल “प्रारंभिक जांच हुई थी” जान लेना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि उस प्रक्रिया के लिए कानून में निर्धारित शर्तें मौजूद थीं या नहीं।

  • क्या सूचना संज्ञेय अपराध से संबंधित थी?
  • क्या संबंधित अपराध में सजा तीन वर्ष या उससे अधिक लेकिन सात वर्ष से कम थी?
  • क्या अपराध की प्रकृति और गंभीरता को ध्यान में रखा गया?
  • क्या DySP या उससे ऊपर के अधिकारी की पूर्व अनुमति ली गई?
  • क्या प्रारंभिक जांच का उद्देश्य प्रथम दृष्टया मामला होने या न होने तक सीमित था?
  • क्या प्रारंभिक जांच 14 दिन के भीतर की गई?

इनमें से प्रत्येक प्रश्न महत्वपूर्ण है। केवल पुलिस द्वारा अपनी कार्रवाई को “प्रारंभिक जांच” नाम दे देने से धारा 173(3) की सभी शर्तें अपने-आप पूरी नहीं हो जातीं।

पुलिस को सूचना मिलने की तारीख कैसे महत्वपूर्ण होती है?

FIR पर दर्ज तारीख यह बताती है कि FIR कब दर्ज हुई। लेकिन उससे यह अपने-आप साबित नहीं होता कि पुलिस को अपराध की सूचना भी पहली बार उसी दिन मिली थी।

लिखित शिकायत पर पुलिस की प्राप्ति रसीद, ऑनलाइन शिकायत की पावती या संदर्भ संख्या, डाक की वितरण जानकारी तथा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजी गई सूचना का उपलब्ध रिकॉर्ड यह पता लगाने में मदद कर सकता है कि सूचना पुलिस तक कब पहुँची।

यदि शिकायत 5 तारीख को पुलिस को मिल चुकी थी लेकिन FIR 9 तारीख को दर्ज हुई, तो अगला प्रश्न यह होगा कि 5 से 9 तारीख के बीच पुलिस ने क्या किया। यही अवधि FIR दर्ज करने में हुई पुलिस की देरी को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।

शिकायत और FIR की तारीख दोनों सुरक्षित रखें

केवल FIR की प्रति पर निर्भर न रहें। मूल शिकायत की प्राप्ति रसीद, ऑनलाइन शिकायत की पावती या संदर्भ संख्या, डाक की वितरण जानकारी तथा उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखें। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि पुलिस को सूचना वास्तव में कब मिली थी।

FIR से पहले पुलिस ने क्या किया, यह क्यों महत्वपूर्ण है?

दो मामलों में शिकायत और FIR के बीच समान रूप से चार दिन का अंतर हो सकता है, लेकिन दोनों की कानूनी स्थिति एक जैसी होना जरूरी नहीं है।

एक मामले में धारा 173(3) की शर्तें पूरी होने पर विधिवत प्रारंभिक जांच की गई हो सकती है। दूसरे मामले में शिकायत केवल लंबित पड़ी रही हो सकती है। इसलिए केवल दिनों की संख्या देखकर दोनों मामलों में पुलिस की जिम्मेदारी एक जैसी तय नहीं की जा सकती।

इसी कारण बाद में दिया गया मौखिक स्पष्टीकरण ही पर्याप्त नहीं होता। यदि पुलिस की कार्यवाही की वैधता का औपचारिक परीक्षण होता है, तो उस समय उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड यह समझने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि शिकायत मिलने के बाद वास्तव में क्या किया गया था।

FIR दर्ज करने में अनुचित देरी पर पुलिस की जिम्मेदारी कैसे तय होगी?

FIR कुछ दिन बाद दर्ज हुई—सिर्फ इस तथ्य से संबंधित पुलिस अधिकारी को दोषी नहीं माना जा सकता। पहले यह देखना होगा कि उस मामले में कानून पुलिस से क्या अपेक्षा करता था और FIR तुरंत दर्ज न करने के लिए कौन-सा कानूनी आधार मौजूद था।

यदि धारा 173(3) के तहत प्रारंभिक जांच की गई, तो उसकी शर्तों का पालन महत्वपूर्ण होगा। यदि FIR दर्ज करने में लगे समय के लिए कोई दूसरा कानूनी आधार बताया जाता है, तो उसकी वैधता लागू कानून और मामले के वास्तविक तथ्यों के अनुसार देखी जाएगी।

लेकिन यदि उपलब्ध तथ्यों और रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि FIR दर्ज करने में लगा समय किसी वैध कानूनी प्रक्रिया से स्पष्ट नहीं होता, तो पुलिस की कार्यवाही की वैधता और संबंधित अधिकारी की विभागीय जवाबदेही का प्रश्न उठ सकता है।

देरी और जवाबदेही में अंतर

FIR कुछ दिन बाद दर्ज होना एक तथ्य है। वह देरी कानून के विरुद्ध थी या नहीं, यह अलग प्रश्न है। और यदि प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ भी हो, तो किसी विशेष अधिकारी की विभागीय जिम्मेदारी तय करना उसके आचरण और उपलब्ध रिकॉर्ड पर निर्भर करेगा।

बाद में FIR दर्ज हो जाए तो क्या पहले की देरी खत्म हो जाती है?

नहीं। बाद में FIR दर्ज हो जाने से यह स्पष्ट होता है कि FIR अंततः दर्ज कर ली गई, लेकिन इससे पहले की पुलिस कार्यवाही अपने-आप महत्वहीन नहीं हो जाती।

यदि बाद में यह प्रश्न उठता है कि पुलिस ने सूचना मिलने के बाद कानून के अनुसार कार्यवाही की थी या नहीं, तो शिकायत मिलने से FIR दर्ज होने तक का घटनाक्रम फिर भी महत्वपूर्ण रहेगा।

इसलिए केवल अंतिम FIR देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उससे पहले की प्रक्रिया सही थी या गलत। उसके लिए यह देखना होगा कि पुलिस को सूचना कब मिली और FIR दर्ज होने तक क्या कार्रवाई की गई।

FIR में देरी और FIR दर्ज करने से इंकार करने में क्या अंतर है?

ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं है कि शिकायत देने के 24 घंटे, 3 दिन, 7 दिन या 14 दिन बाद FIR दर्ज न हो तो उसे अपने-आप FIR दर्ज करने से इंकार मान लिया जाए।

यदि कानून के अनुसार प्रारंभिक जांच की जा रही है, तो स्थिति अलग हो सकती है। लेकिन यदि पुलिस संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से स्पष्ट रूप से इंकार करती है, तो इसे केवल देरी नहीं माना जाएगा। ऐसी स्थिति में यह देखना होगा कि FIR दर्ज करने से इंकार करना कब अवैध है।

FIR दर्ज करने में देरी पर सुप्रीम कोर्ट की क्या स्थिति है?

पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के समय Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh में Supreme Court की संविधान पीठ ने FIR दर्ज करने और प्रारंभिक जांच से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए थे। इनमें संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करने तथा सीमित परिस्थितियों में प्रारंभिक जांच की अनुमति से संबंधित सिद्धांत शामिल थे।

BNSS लागू होने के बाद Supreme Court ने Imran Pratapgadhi v. State of Gujarat (2025) में धारा 173 की नई कानूनी व्यवस्था पर विचार किया। न्यायालय ने धारा 173(3) को धारा 173 की सामान्य व्यवस्था के भीतर विधायिका द्वारा बनाया गया एक विशेष अपवाद माना।

इसलिए आज FIR से पहले की प्रारंभिक जांच को केवल पुराने CrPC के आधार पर नहीं देखा जा सकता। BNSS की धारा 173(3) में अब सजा की सीमा, अपराध की प्रकृति और गंभीरता, वरिष्ठ अधिकारी की पूर्व अनुमति और 14 दिन की अवधि जैसी स्पष्ट शर्तें दी गई हैं।

इस कारण किसी वर्तमान मामले में पुलिस द्वारा FIR से पहले प्रारंभिक जांच की वैधता देखते समय BNSS की धारा 173(3) को केंद्र में रखकर ही पुराने निर्णयों के सिद्धांतों को समझना चाहिए।

अपने मामले में FIR की देरी को कैसे परखें?

यदि शिकायत देने और FIR दर्ज होने की तारीख अलग-अलग है, तो केवल दिनों की संख्या गिनने के बजाय इन प्रश्नों के उत्तर क्रम से देखें:

  • पुलिस को संज्ञेय अपराध की सूचना पहली बार कब मिली?
  • उस सूचना की receiving, acknowledgement या कोई दूसरा record उपलब्ध है?
  • FIR किस तारीख और समय पर दर्ज हुई?
  • बीच के समय में पुलिस ने क्या किया?
  • यदि प्रारंभिक जांच बताई गई है, तो क्या संबंधित अपराध धारा 173(3) में निर्धारित सजा की सीमा में आता है?
  • क्या अपराध की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए यह प्रक्रिया अपनाई गई?
  • क्या DySP या उससे ऊपर के अधिकारी की पूर्व अनुमति ली गई?
  • क्या प्रारंभिक जांच 14 दिन के भीतर की गई?
  • क्या उपलब्ध रिकॉर्ड पुलिस द्वारा बताए गए कारण से मेल खाता है?

इन प्रश्नों से शिकायतकर्ता स्वयं किसी पुलिस अधिकारी को दोषी घोषित नहीं कर सकता। इनका उद्देश्य यह समझना है कि FIR दर्ज करने में लगा समय किसी कानूनी प्रक्रिया से समझाया जा सकता है या उस देरी के कारण और पुलिस की जिम्मेदारी पर वास्तविक प्रश्न उठता है।

मुख्य बातें (Key Takeaways)

📌 एक नज़र में
  • पुलिस की ओर से हुई देरी समझने के लिए घटना की तारीख नहीं, पुलिस को सूचना मिलने की तारीख महत्वपूर्ण है।
  • हर संज्ञेय शिकायत को पुलिस 14 दिन तक लंबित नहीं रख सकती।
  • BNSS धारा 173(3) कुछ निर्धारित मामलों में ही प्रारंभिक जांच की अनुमति देती है।
  • ऐसी प्रारंभिक जांच के लिए अपराध की सजा की सीमा, उसकी प्रकृति और गंभीरता तथा DySP स्तर के अधिकारी की पूर्व अनुमति महत्वपूर्ण हैं।
  • केवल “प्रारंभिक जांच चल रही थी” कह देने से FIR दर्ज करने में हुई देरी अपने-आप उचित नहीं हो जाती।
  • शिकायत की receiving और FIR की तारीख के बीच पुलिस ने क्या किया, यह देरी की वैधता समझने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
  • बाद में FIR दर्ज हो जाने से उससे पहले की पुलिस कार्यवाही का प्रश्न अपने-आप समाप्त नहीं होता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या हर FIR दर्ज करने के लिए पुलिस को 14 दिन मिलते हैं?

नहीं। 14 दिन प्रत्येक FIR के लिए सामान्य समय-सीमा नहीं है। यह BNSS धारा 173(3) के अंतर्गत निर्धारित मामलों में की जाने वाली प्रारंभिक जांच से संबंधित अवधि है।

क्या पुलिस यह कहकर FIR रोक सकती है कि पहले शिकायत की जांच करेंगे?

हर मामले में नहीं। यह देखना होगा कि FIR से पहले प्रारंभिक जांच करने की कानून में अनुमति थी या नहीं और यदि धारा 173(3) लागू की गई है तो उसकी आवश्यक शर्तों का पालन हुआ था या नहीं।

क्या प्रारंभिक जांच के लिए DySP की अनुमति जरूरी है?

BNSS धारा 173(3) के तहत यह प्रक्रिया अपनाने के लिए ऐसे अधिकारी की पूर्व अनुमति आवश्यक है जो Deputy Superintendent of Police (DySP) के पद से नीचे का न हो।

मैंने शिकायत पहले दी थी और FIR बाद में हुई—क्या इससे पुलिस की गलती साबित हो जाती है?

नहीं। इससे पुलिस को सूचना मिलने और FIR दर्ज होने के बीच का समय पता लगाने में मदद मिलती है। इसके बाद यह देखना होगा कि उस अवधि में पुलिस ने क्या किया और उसके लिए कानून में कोई वैध आधार था या नहीं।

क्या 14 दिन से अधिक बाद दर्ज FIR अपने-आप अवैध हो जाती है?

नहीं। केवल शिकायत और FIR की तारीखों के अंतर से ऐसा सामान्य निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। 14 दिन की अवधि धारा 173(3) वाली प्रारंभिक जांच से संबंधित है। किसी मामले में पुलिस की देरी का आकलन उस पर लागू कानून और वास्तविक कार्यवाही के आधार पर होगा।

बाद में FIR दर्ज हो जाए तो क्या पहले की देरी महत्वहीन हो जाती है?

नहीं। यदि यह प्रश्न उठता है कि पुलिस ने सूचना मिलने के बाद कानून के अनुसार कार्यवाही की थी या नहीं, तो सूचना मिलने से FIR दर्ज होने तक का घटनाक्रम बाद में भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

निष्कर्ष

FIR दर्ज करने में पुलिस की जिम्मेदारी केवल यह देखकर तय नहीं की जा सकती कि FIR कितने दिन बाद दर्ज हुई। सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि पुलिस को संज्ञेय अपराध की सूचना कब मिली और उसके बाद FIR तुरंत दर्ज न करने का कानूनी आधार क्या था।

BNSS की धारा 173(3) कुछ निर्धारित मामलों में प्रारंभिक जांच की अनुमति देती है, लेकिन यह हर शिकायत को 14 दिन तक लंबित रखने की सामान्य अनुमति नहीं है। इसलिए शिकायत मिलने और FIR दर्ज होने के बीच की अवधि को पुलिस द्वारा अपनाई गई वास्तविक प्रक्रिया और उस पर लागू कानून के साथ देखकर ही देरी की वैधता समझी जा सकती है।

यदि FIR बाद में दर्ज हो भी जाए, तब भी शिकायत मिलने से registration तक का घटनाक्रम महत्वपूर्ण रह सकता है। इसलिए शिकायत की receiving, उपलब्ध acknowledgement और FIR की तारीख जैसे रिकॉर्ड सुरक्षित रखना उपयोगी है।