एक FIR दर्ज हो जाने के बाद दूसरी FIR हमेशा प्रतिबंधित नहीं होती। सामान्यतः एक ही घटना और आपस में जुड़ी उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला (same transaction) के उसी पक्ष को दोहराने वाली दूसरी FIR दर्ज नहीं की जा सकती। लेकिन जवाबी शिकायत, घटना का विरोधी पक्ष, अलग घटना, अलग दायरे का मामला, बाद में सामने आई बड़ी आपराधिक साजिश या पहले अज्ञात महत्वपूर्ण तथ्यों जैसी परिस्थितियों में दूसरी FIR कानूनी रूप से संभव हो सकती है।

इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि दोनों FIR में आरोपी, धाराएं या शिकायतकर्ता समान हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या दोनों FIR वास्तव में उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला को दोहरा रही हैं या दोनों मामलों का वास्तविक तथ्यात्मक आधार (factual foundation) और दायरा (scope) अलग है।

दूसरी FIR का सामान्य नियम क्या है?

यदि किसी मामले में संज्ञेय और असंज्ञेय अपराध में अंतर समझने के बाद किसी संज्ञेय अपराध की सूचना पर FIR पहले ही दर्ज हो चुकी है और उसकी जांच शुरू हो गई है, तो उसी घटना के बारे में बाद में मिलने वाली हर नई सूचना पर अलग FIR दर्ज करना सामान्य नियम नहीं है। FIR के बाद शुरू होने वाली जांच के दौरान उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला से जुड़े अन्य तथ्य, आरोपी, अपराध और साक्ष्य भी सामने आ सकते हैं।

Supreme Court ने T.T. Antony v. State of Kerala में यह सिद्धांत स्थापित किया कि एक ही घटना या उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला से जुड़े अपराधों के संबंध में बार-बार FIR दर्ज करके नई जांच शुरू करना सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है। बाद में मिलने वाली जानकारी को मौजूदा जांच में शामिल किया जा सकता है।

मुख्य नियम

केवल नया आरोप, नई धारा, नया आरोपी या नया साक्ष्य सामने आने से अपने-आप दूसरी FIR दर्ज करने का आधार नहीं बनता। पहले यह देखना आवश्यक है कि बाद में सामने आया मामला उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला का हिस्सा है या वास्तव में अलग अपराध अथवा स्वतंत्र घटना है।

दूसरी FIR कब दर्ज हो सकती है?

Supreme Court ने State of Rajasthan v. Surendra Singh Rathore, 2025 INSC 248 में अपने पूर्व निर्णयों का विश्लेषण करते हुए उन प्रमुख परिस्थितियों को स्पष्ट किया जिनमें बाद की FIR (subsequent FIR) स्वीकार्य हो सकती है। Court ने यह भी स्पष्ट किया कि दूसरी FIR पर कोई पूर्ण और हर परिस्थिति में लागू होने वाला प्रतिबंध नहीं है।

1. जवाबी शिकायत या घटना का विरोधी पक्ष हो

एक ही घटना के दो पक्ष अलग-अलग बातें बता सकते हैं। उदाहरण के लिए, A और B के बीच झगड़ा हुआ। A ने पहले B के खिलाफ FIR दर्ज करा दी, लेकिन B का कहना है कि वास्तव में हमला A ने किया था और उसने केवल अपना बचाव किया।

ऐसी स्थिति में B की शिकायत घटना का अलग या विरोधी पक्ष (rival version) मानी जा सकती है। इसे केवल इस आधार पर रोका नहीं जा सकता कि A पहले FIR दर्ज करा चुका है।

Supreme Court ने Upkar Singh v. Ved Prakash में स्पष्ट किया कि वास्तविक जवाबी शिकायत (counter-complaint) या विरोधी पक्ष पर केवल पहली FIR दर्ज होने के कारण रोक नहीं लगाई जा सकती।

2. दोनों FIR का वास्तविक दायरा अलग हो

दो FIR एक ही पृष्ठभूमि या कुछ समान परिस्थितियों से उत्पन्न हो सकती हैं, लेकिन उनका वास्तविक दायरा अलग हो सकता है। केवल कुछ तथ्य समान होने से दूसरी FIR अपने-आप अवैध नहीं हो जाती।

यदि पहली FIR किसी सीमित घटना से संबंधित है और दूसरी FIR किसी अलग या उससे अधिक व्यापक आपराधिक गतिविधि को सामने लाती है, तो दोनों FIR के वास्तविक दायरे और तथ्यों की तुलना करनी होगी।

3. बाद में बड़ी आपराधिक साजिश सामने आए

पहली FIR किसी सीमित घटना के आधार पर दर्ज हुई हो सकती है। बाद में जांच, दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य या अन्य स्रोतों से यह सामने आ सकता है कि वह घटना किसी बड़ी आपराधिक साजिश (larger conspiracy) यानी आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा थी।

यदि बाद में सामने आई साजिश का दायरा पहली FIR में जांचे जा रहे मामले से वास्तव में अलग और व्यापक है, तो परिस्थितियों के आधार पर दूसरी FIR या अलग जांच का प्रश्न उत्पन्न हो सकता है।

4. पहले अज्ञात महत्वपूर्ण तथ्य सामने आएं

पहली FIR दर्ज करते समय कुछ महत्वपूर्ण तथ्य उपलब्ध नहीं हो सकते। जांच के दौरान ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो केवल पहली FIR के आरोपों की पुनरावृत्ति न होकर किसी अलग घटना या अलग आपराधिक आधार को सामने लाते हों।

ऐसी स्थिति में यह देखना होगा कि नए तथ्य मौजूदा मामले की ही जांच का हिस्सा हैं या वे कोई स्वतंत्र मामला प्रस्तुत करते हैं जिसके लिए अलग FIR उचित हो सकती है।

5. घटना वास्तव में अलग और स्वतंत्र हो

यदि दूसरी शिकायत किसी अलग घटना से संबंधित है, तो अलग FIR दर्ज की जा सकती है, भले ही आरोपी वही व्यक्ति हो और अपराध की प्रकृति भी समान हो।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति ने जनवरी में एक व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी की और तीन महीने बाद किसी दूसरे व्यक्ति के साथ अलग लेन-देन में धोखाधड़ी की। केवल आरोपी समान होने से दोनों घटनाएं एक ही FIR का हिस्सा नहीं बन जातीं।

Supreme Court का सार

2025 के Surendra Singh Rathore मामले में Supreme Court ने जवाबी शिकायत, अलग दायरा, बाद में सामने आई बड़ी साजिश, पहले अज्ञात महत्वपूर्ण तथ्य और अलग घटना जैसी परिस्थितियों को उन स्थितियों में शामिल किया जिनमें दूसरी FIR स्वीकार्य हो सकती है।

दूसरी FIR के लिए “Test of Sameness” क्या है?

दूसरी FIR वैध है या नहीं, यह तय करने में न्यायालय यह देखते हैं कि दोनों FIR वास्तव में एक ही घटना या आपस में जुड़ी उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला से संबंधित हैं या स्वतंत्र मामलों से। इस जांच को सामान्यतः समानता की कसौटी (Test of Sameness) कहा जाता है।

केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि दोनों FIR में समान धाराएं, वही आरोपी या कुछ समान तथ्य हैं। दोनों मामलों की पूरी परिस्थितियों और घटनाओं के आपसी संबंध की तुलना करनी होती है।

एक ही आपराधिक घटना-श्रृंखला की पहचान कैसे होती है?

इसके लिए कोई एक निश्चित और हर मामले में लागू होने वाला सूत्र नहीं है। मामले के तथ्यों के अनुसार निम्न बातें महत्वपूर्ण हो सकती हैं:

  • दोनों घटनाओं के बीच समय की निकटता;
  • स्थान और घटनाओं का आपसी संबंध;
  • घटनाओं की लगातार जुड़ी हुई श्रृंखला;
  • समान उद्देश्य या साझा योजना;
  • दोनों आरोपों का आपसी तथ्यात्मक संबंध;
  • क्या दोनों घटनाएं एक ही लगातार चलने वाली आपराधिक कार्रवाई का हिस्सा हैं।

यदि दोनों FIR एक ही घटना या ऐसी जुड़ी हुई घटनाओं से संबंधित हैं जो मिलकर एक ही आपराधिक घटना-श्रृंखला बनाती हैं, तो दूसरी FIR पर रोक लग सकती है। लेकिन यदि दूसरा मामला अलग घटना, अलग तथ्यात्मक आधार या विरोधी पक्ष प्रस्तुत करता है, तो स्थिति अलग होगी।

आसान तरीका

सवाल यह नहीं है कि “दोनों FIR में वही व्यक्ति है या नहीं।” सही सवाल यह है कि “क्या दोनों FIR उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला की दोबारा जांच करा रही हैं?”

Cross-FIR और प्रतिबंधित दूसरी FIR में क्या अंतर है?

Cross-FIR या counter-FIR और प्रतिबंधित दूसरी FIR एक ही चीज नहीं हैं।

प्रतिबंधित दूसरी FIR में सामान्यतः उसी घटना और उसी पक्ष को दूसरी बार FIR के रूप में दर्ज करने का प्रयास होता है। इसके विपरीत Cross-FIR में घटना का दूसरा पक्ष अपना अलग और विरोधी कथन प्रस्तुत करता है।

उदाहरण के लिए, A का आरोप है कि B ने उस पर हमला किया। B का कहना है कि हमला पहले A और उसके साथियों ने किया था। दोनों शिकायतें एक ही घटना से संबंधित हैं, लेकिन दोनों अलग-अलग पक्ष प्रस्तुत करती हैं।

Supreme Court ने स्पष्ट किया है कि ऐसी वास्तविक जवाबी शिकायत को केवल पहली FIR दर्ज होने के कारण प्रतिबंधित नहीं माना जा सकता।

पहली FIR के बाद नई जानकारी सामने आए तो क्या होगा?

पहली FIR दर्ज होने के बाद जांच में नए तथ्य सामने आना सामान्य बात है। हर नई जानकारी या नई परिस्थिति के लिए दूसरी FIR आवश्यक नहीं होती।

नई धाराएं सामने आएं

यदि जांच में यह पता चलता है कि उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला में अन्य अपराध भी हुए हैं, तो केवल नई कानूनी धाराएं जुड़ने के कारण दूसरी FIR दर्ज करना आवश्यक नहीं है।

नई धारा और नई FIR दो अलग कानूनी प्रश्न हैं। महत्वपूर्ण यह है कि नया अपराध उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला का हिस्सा है या वास्तव में अलग घटना है।

नया आरोपी सामने आए

यदि जांच में किसी नए व्यक्ति की भूमिका सामने आती है और उसकी कथित भूमिका उसी घटना या उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला से संबंधित है, तो केवल नया आरोपी मिलने के कारण दूसरी FIR आवश्यक नहीं होती।

उस व्यक्ति की भूमिका मौजूदा जांच में ही जांची जा सकती है। यदि उसके संबंध में अलग और स्वतंत्र आपराधिक घटना सामने आती है, तभी अलग FIR का प्रश्न उत्पन्न हो सकता है।

नया साक्ष्य सामने आए

नई CCTV footage, mobile data, bank records, electronic records, documents या witnesses मिलने से अपने-आप दूसरी FIR आवश्यक नहीं होती।

यदि नया साक्ष्य पहली FIR वाली घटना से संबंधित है, तो उसे उसी जांच या कानून के अनुसार आगे की जांच (further investigation) में शामिल किया जा सकता है।

महत्वपूर्ण अंतर

नया साक्ष्य और नई आपराधिक घटना एक ही बात नहीं हैं। पुराने मामले के बारे में नया साक्ष्य मिलने से अपने-आप नया आपराधिक मामला पैदा नहीं होता।

BNSS धारा 193(9) और आगे की जांच का क्या संबंध है?

BNSS धारा 193 में जांच पूरी होने पर पुलिस रिपोर्ट/चार्जशीट Magistrate को भेजने की प्रक्रिया दी गई है। धारा 193(9) स्पष्ट करती है कि report भेज दिए जाने के बाद भी संबंधित अपराध में आगे की जांच (further investigation) पर पूर्ण रोक नहीं लगती।

आगे की जांच में अतिरिक्त साक्ष्य मिलने पर आगे की जांच के बाद सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करने की स्थिति भी बन सकती है। इसलिए police report दाखिल होने के बाद उसी अपराध से संबंधित नया साक्ष्य मिलने पर केवल इसी कारण दूसरी FIR आवश्यक नहीं हो जाती।

यदि trial शुरू हो चुका है, तो BNSS धारा 193(9) के proviso के अनुसार आगे की जांच Court की permission से की जा सकती है। सामान्यतः ऐसी जांच 90 दिनों के भीतर पूरी की जानी है, हालांकि Court अनुमति देकर यह अवधि बढ़ा सकता है।

उदाहरण

किसी हत्या के मामले में police report दाखिल होने के बाद घटना का महत्वपूर्ण CCTV video मिल जाता है। यदि video उसी हत्या से संबंधित है, तो केवल उसके बाद मिलने के कारण दूसरी हत्या की FIR दर्ज करना आवश्यक नहीं है। उस साक्ष्य को आगे की जांच में शामिल किया जा सकता है।

एक आरोपी, शिकायतकर्ता या कई पीड़ित हों तो FIR की संख्या कैसे तय होती है?

FIR की संख्या केवल इस आधार पर तय नहीं होती कि आरोपी, शिकायतकर्ता या पीड़ित कितने हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि घटनाएं और लेन-देन आपस में कितने जुड़े हुए हैं और क्या वे एक ही आपराधिक घटना-श्रृंखला का हिस्सा हैं।

एक ही आरोपी के खिलाफ कई FIR

एक ही व्यक्ति के खिलाफ एक से अधिक FIR दर्ज हो सकती हैं यदि वे अलग-अलग और स्वतंत्र आपराधिक घटनाओं से संबंधित हों। कानून किसी आरोपी को केवल एक FIR तक सीमित नहीं करता।

एक ही शिकायतकर्ता द्वारा कई FIR

एक ही शिकायतकर्ता भी अलग-अलग स्वतंत्र घटनाओं के संबंध में अलग FIR दर्ज करा सकता है। शिकायतकर्ता का वही व्यक्ति होना अपने-आप दूसरी FIR पर रोक नहीं लगाता।

लेकिन उसी घटना और उसी आरोपों को दोबारा FIR के रूप में दर्ज कराने पर दूसरी FIR की वैधता का प्रश्न उत्पन्न होगा।

एक आरोपी और कई पीड़ित

कई पीड़ित होने से हर पीड़ित के लिए स्वतः अलग FIR जरूरी नहीं हो जाती और न ही सभी शिकायतों को हमेशा एक ही FIR में रखना आवश्यक होता है।

यदि प्रत्येक पीड़ित के साथ अलग समय, अलग तरीके और अलग लेन-देन में धोखाधड़ी हुई है, तो वे अलग घटनाएं हो सकती हैं। इसके विपरीत यदि सभी शिकायतें एक ही समग्र योजना या आपस में जुड़ी आपराधिक घटना-श्रृंखला का हिस्सा हैं, तो उनकी कानूनी स्थिति तथ्यों पर निर्भर करेगी।

सावधानी

“एक आरोपी = एक FIR” या “एक पीड़ित = एक FIR” जैसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। हर मामले में घटनाओं और लेन-देन के वास्तविक संबंध को देखना आवश्यक है।

दूसरी FIR संभव है या नहीं—कैसे समझें?

  • वही घटना + वही आपराधिक घटना-श्रृंखला + वही पक्ष: सामान्यतः दूसरी FIR नहीं।
  • वही घटना + दूसरे पक्ष का विरोधी कथन: counter-FIR संभव हो सकती है।
  • अलग और स्वतंत्र घटना: अलग FIR संभव है।
  • उसी मामले में नया साक्ष्य: सामान्यतः मौजूदा जांच या आगे की जांच में शामिल किया जाएगा।
  • उसी घटना में नया आरोपी: केवल इस कारण दूसरी FIR आवश्यक नहीं।
  • नई धाराएं सामने आएं: केवल धाराएं बढ़ने या बदलने से नई FIR जरूरी नहीं।
  • पहली FIR से अलग दायरा या बड़ी साजिश सामने आए: मामले के तथ्यों के आधार पर दूसरी FIR संभव हो सकती है।

Supreme Court ने दूसरी FIR पर क्या कहा है?

T.T. Antony v. State of Kerala

इस निर्णय में Supreme Court ने एक ही घटना या उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला से संबंधित अपराधों के लिए बार-बार FIR दर्ज करने और नई जांच शुरू करने के विरुद्ध मूल सिद्धांत निर्धारित किया। उसी मामले में बाद में मिलने वाली जानकारी को सामान्यतः मौजूदा जांच में लिया जाना चाहिए।

Upkar Singh v. Ved Prakash

इस फैसले में Supreme Court ने स्पष्ट किया कि T.T. Antony का सिद्धांत वास्तविक जवाबी शिकायत को प्रतिबंधित नहीं करता। यदि उसी घटना का दूसरा पक्ष अपना अलग और विरोधी कथन देता है, तो counter-FIR संभव हो सकती है।

Babubhai v. State of Gujarat

Supreme Court ने स्पष्ट किया कि दोनों FIR के तथ्यों और परिस्थितियों की तुलना करके समानता की कसौटी (Test of Sameness) लागू की जानी चाहिए। यदि दोनों FIR एक ही घटना या उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला का हिस्सा हैं, तो बाद की FIR पर रोक लग सकती है।

लेकिन यदि दूसरी FIR अलग घटना या घटना का अलग विरोधी पक्ष प्रस्तुत करती है, तो उसका अलग से दर्ज होना संभव हो सकता है।

State of Rajasthan v. Surendra Singh Rathore, 2025 INSC 248

इस निर्णय में Supreme Court ने दूसरी FIR से संबंधित पूर्व judgments का विश्लेषण करते हुए पाँच महत्वपूर्ण परिस्थितियों को संक्षेपित किया—जवाबी शिकायत या विरोधी पक्ष, दोनों FIR का अलग दायरा, बाद में सामने आई बड़ी साजिश, पहले अज्ञात महत्वपूर्ण तथ्य और अलग घटना।

इस मामले में Court ने पाया कि पहली FIR एक विशेष घटना तक सीमित थी, जबकि दूसरी FIR संबंधित विभाग में कथित व्यापक भ्रष्टाचार से जुड़े बड़े मामले से संबंधित थी। इस कारण Court ने दोनों FIR का वास्तविक दायरा अलग माना।

कानूनी स्थिति

दूसरी FIR की वैधता केवल इस आधार पर तय नहीं की जाती कि दोनों FIR में कुछ आरोप समान हैं। न्यायालय दोनों FIR के वास्तविक तथ्यात्मक आधार, दायरे, घटना और आपराधिक घटना-श्रृंखला के संबंध को देखकर निर्णय करता है।

गलत तरीके से दूसरी FIR दर्ज हो जाए तो क्या किया जा सकता है?

यदि दूसरी FIR कानूनन टिकाऊ नहीं है, तो प्रभावित व्यक्ति उसे क्षेत्राधिकार रखने वाले High Court के समक्ष चुनौती दे सकता है। ऐसी स्थिति में यह समझना उपयोगी है कि High Court किन परिस्थितियों में FIR रद्द कर सकता है।

लेकिन केवल यह दिखाना पर्याप्त नहीं होगा कि दोनों FIR में आरोपी, धाराएं या कुछ आरोप समान हैं। Court यह देखेगा कि क्या दूसरी FIR वास्तव में पहले मामले की पुनरावृत्ति है या उसका कोई स्वतंत्र तथ्यात्मक आधार है।

इसलिए ऐसी चुनौती में दोनों FIR के आरोप, घटनाओं का क्रम, शिकायतकर्ताओं के कथन, घटनाओं का आपसी संबंध और दोनों मामलों का दायरा महत्वपूर्ण होता है।

मुख्य बातें

📌 एक नज़र में
  • एक ही घटना और उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला के उसी पक्ष पर दूसरी FIR सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है।
  • वास्तविक जवाबी शिकायत या विरोधी पक्ष के आधार पर दूसरी FIR संभव हो सकती है।
  • अलग और स्वतंत्र घटना के लिए अलग FIR दर्ज हो सकती है।
  • दोनों FIR का वास्तविक दायरा अलग होने पर बाद की FIR स्वीकार्य हो सकती है।
  • बाद में बड़ी आपराधिक साजिश या पहले अज्ञात महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने पर स्थिति अलग हो सकती है।
  • नया आरोपी, नई धारा या नया साक्ष्य अपने-आप दूसरी FIR का आधार नहीं बनता।
  • BNSS धारा 193(9) police report के बाद आगे की जांच और आगे की report की व्यवस्था करती है।
  • एक ही आरोपी के खिलाफ कई FIR हो सकती हैं यदि घटनाएं स्वतंत्र हों।
  • कई पीड़ित होने पर FIR की संख्या घटनाओं और लेन-देन के आपसी संबंध पर निर्भर करेगी।
  • दूसरी FIR की वैधता में एक ही आपराधिक घटना-श्रृंखला और वास्तविक तथ्यात्मक आधार सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होते हैं।

निष्कर्ष

यह कहना सही नहीं है कि एक FIR दर्ज हो जाने के बाद किसी भी परिस्थिति में दूसरी FIR नहीं हो सकती। सही कानूनी स्थिति यह है कि एक ही घटना और उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला के उसी पक्ष को दोहराने वाली दूसरी FIR सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है

लेकिन जवाबी शिकायत, अलग घटना, अलग दायरा, बाद में सामने आई बड़ी आपराधिक साजिश या पहले अज्ञात महत्वपूर्ण तथ्यों जैसी परिस्थितियों में दूसरी FIR संभव हो सकती है। दूसरी ओर, उसी घटना में नया साक्ष्य, नई धारा या नया आरोपी सामने आने पर सामान्यतः पहले मौजूदा जांच और आगे की जांच की व्यवस्था को देखा जाएगा।

इसलिए दूसरी FIR की वैधता तय करने का वास्तविक आधार FIR की संख्या नहीं बल्कि दोनों मामलों के तथ्य, दायरा और घटनाओं के आपसी संबंध हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या एक ही घटना की दो FIR हो सकती हैं?

सामान्यतः एक ही घटना और उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला के उसी पक्ष को दोहराने वाली दूसरी FIR स्वीकार्य नहीं है। लेकिन दूसरे पक्ष की वास्तविक जवाबी शिकायत या अन्य मान्य अपवाद अलग स्थिति हो सकते हैं।

क्या counter-FIR दर्ज की जा सकती है?

हाँ। यदि घटना का दूसरा पक्ष अपना वास्तविक और विरोधी कथन प्रस्तुत करता है, तो पहली FIR का अस्तित्व अपने-आप counter-FIR पर रोक नहीं लगाता।

नया आरोपी मिलने पर क्या दूसरी FIR जरूरी है?

नहीं। यदि नए आरोपी की भूमिका उसी घटना और उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला से संबंधित है, तो उसकी जांच मौजूदा FIR में की जा सकती है।

नया साक्ष्य मिलने पर क्या नई FIR होगी?

जरूरी नहीं। यदि नया साक्ष्य उसी अपराध या घटना से संबंधित है, तो उसे मौजूदा जांच या आगे की जांच में शामिल किया जा सकता है।

क्या एक ही व्यक्ति के खिलाफ कई FIR हो सकती हैं?

हाँ। यदि वही व्यक्ति अलग-अलग और स्वतंत्र आपराधिक घटनाओं में शामिल है, तो उसके खिलाफ अलग-अलग FIR दर्ज हो सकती हैं।

गलत दूसरी FIR को कैसे चुनौती दी जा सकती है?

यदि दूसरी FIR वास्तव में उसी घटना और उसी आपराधिक घटना-श्रृंखला की पुनरावृत्ति है, तो उसकी वैधता को संबंधित High Court के समक्ष चुनौती दी जा सकती है। अंतिम निर्णय दोनों FIR के तथ्यों और वास्तविक दायरे की तुलना पर निर्भर करेगा।